मानखुर्द (मुम्‍बई ) के एक मेहनतकश परिवार पर दीवाली की पहली रात टूटा दुखों का पहाड़

एक मेहनतकश परिवार अपनी पाई पाई जोड़कर दिवाली की तैयारी कर रहा था। बच्चे भी खुश थे व गलियों में चहकते घूम रहे थे। भूमिका की उम्र मात्र साढे चार साल है। वो गलियों में अपने दोस्तों के संग खेल रही थी। मानखुर्द के इस भीड़भाड़ वाले इलाके में संकरी गलियों में लगातार आते जाते वाहन हमेशा दुर्घटना का सिग्नल देते रहते हैं। यहां अक्सर छोटी-मोटी दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं। पर भूमिका के लिए कल की दुर्घटना प्राणान्तक सिद्ध हुई। मुर्गी ढोने वाले एक टेम्पो के नीचे आने से उसकी मौत हो गई। ऐसी दुर्घटना के बाद जैसा कि होता है, लोगों का गुस्सा ड्राइवर पर निकला। उसे पीटकर पुलिस के हवाले कर दिया गया। पर सिर्फ मानखुर्द ही नहीं बल्कि मुम्बई (व अन्य शहरों के भी) के मेहनतकश लोगों की हर जगह ऐसी ही भयंकर भीड़ भाड़ वाली है। इन इलाकों की गलियां बेहद पतली है, बच्चों के लिए खेलने की कोई ऑपन जगह नहीं है या बेहद कम है। ऐसे में बच्चे रोड़ पर ही बैठते हैं व खेलते हैं। जो लोग इस मुम्बई को चलाते हैं, सब चीजों का उत्पादन करते हैं, उनके बच्चे ऐसी हालात में जीने व कई बार तो दर्दनाक मौत मरने को मजबूर होते हैं।
भगतसिंह ने 1929 में कहा था, (जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है)
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
भगतसिंह ने इस परिस्थिति को बदलने का रास्ता भी देश के नौजवानों को दिखलाया था। ये हम पर है कि हम उस रास्ते पर कितना आगे बढ़ पाते हैं।
क्रान्ति से हमारा क्या आशय है, यह स्पष्ट है। इस शताब्दी में इसका सिर्फ एक ही अर्थ हो सकता है — जनता के लिए जनता का राजनीतिक शक्ति हासिल करना। वास्तव में यही है ‘क्रान्ति’, बाकी सभी विद्रोह तो सिर्फ मालिकों के परिवर्तन द्वारा पूँजीवादी सड़ाँध को ही आगे बढ़ाते हैं। किसी भी हद तक लोगों से या उनके उद्देश्यों से जतायी हमदर्दी जनता से वास्तविकता नहीं छिपा सकती, लोग छल को पहचानते हैं। भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को — भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगार हटाकर जो कि उसी आर्थिक व्यवस्था के पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें, शोषण पर आधारित हैं — आगे आना है। हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयाँ, एक स्वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्थान लेने के लिए तैयार हैं। ……….हमें याद रखना चाहिए कि श्रमिक क्रान्ति के अतिरिक्त न किसी और क्रान्ति की इच्छा करनी चाहिए और न ही वह सफल हो सकती है।
नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फ़ैक्टरी-कारख़ानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोंपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।
भगतसिंह का ये पैगाम और भूमिका जैसे तमाम बच्चे आज भी देश के उन नौजवानों की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो इस परिस्थिति को बदलने के लिए अपना जीवन न्यौछावर करेंगे। इन बस्तियों में आकर सब कुछ बदलने के लिए मेहनतकश जनता के साथ एकमेक हो जायेंगे।
नौजवान भारत सभा, महाराष्ट्र

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