बाबरी मस्ज़िद विध्वंस मामले में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने साम्प्रदायिक नफ़रत के सभी 32 दोषियों को किया बरी !
सीबीआई स्पेशल कोर्ट का न्याय; न्याय है या न्यायबोध पर कुठाराघात ?
– नौजवान भारत सभा
दोस्तो, साथियो! आप सभी ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक “अन्धेर नगरी” की कहानी तो ज़रूर पता ही होगी जिसमें दोषी को इसी आधार पर छोड़ दिया गया था क्योंकि उसकी गर्दन पतली थी और फाँसी के फन्दे में नहीं आती थी तथा उसकी जगह पर मोटी गर्दन वाले गोबरधन दास को फाँसी पर चढ़ाने की तैयारी कर दी गयी थी क्योंकि उसकी गर्दन फन्दे में एकदम फिट बैठती थी? बाबरी मस्ज़िद विध्वंस मामले में भी न्याय के साथ कुछ ऐसा ही होता प्रतीत हो रहा है। लखनऊ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सभी 32 आरोपियों को दोषमुक्त करार दे दिया है जबकि उन सबके ख़िलाफ़ चिल्लाते-चिल्लाते खुद सबूतों के गले छिल चुके हैं। कोर्ट का अपने फैसले में कहना है कि बाबरी विध्वंस सुनियोजित नहीं था। कोर्ट ने कहा कि अराजक तत्वों ने ढांचा गिराया था और आरोपी नेताओं ने इन लोगों को रोकने का प्रयास किया था। स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं तथा सीबीआई की तरफ से जुटाये गये ऑडियो और वीडियो सबूतों की प्रमाणिकता को जाँचा नहीं जा सकता है तथा न ही वे स्पष्ट हैं। मतलब इस फैसले में कोर्ट ने न केवल अपराधियों को अपराधमुक्त कर दिया बल्कि उन्हें सद्भाव स्थापित करने वाला शान्ति दूत भी करार दे दिया। और यह किया कैसे? वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति की तर्ज पर! सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने ‘नीरक्षीर विवेक’ करते हुए दूध का दूध और पानी का पानी तो नहीं किया है किन्तु काले को सफेद और सफेद को काला ज़रूर कर दिया है। इस मामले में फैसला सुनाने वाले सीबीआई कोर्ट के स्पेशल जज एसके यादव एक साल पहले ही रिटायर होने वाले थे अब वे और भी अधिक सुखद भविष्य की उम्मीद के साथ शान्ति से रिटायर हो जायेंगे!
कोर्ट के फैसले के बाद न्यायपसन्द लोगों के ज़ेहन में नये सवाल ये उभर रहे हैं कि यदि यह कुकर्म पूर्वनिर्धारित-पूर्वनियोजित नहीं था तो फ़िर आडवाणी के नेतृत्व में संघी गिरोह की रथयात्राएँ किस चीज़ के लिए निकाली जा रही थी? यदि बाबरी मस्ज़िद को गिराया जाना तय नहीं था तो हज़ारों की तादाद में गैन्ती, छैनी, हथोड़े, दुर्मच, रस्से, कस्सी, फावड़े और तसले इत्यादि घटनास्थल तक कैसे पहुँच गये? यदि मस्ज़िद गिराने वाली यह भीड़ इतनी ही अराजक थी तो संघी शिविरों में कार सेवा के नाम पर ढाँचे को गिराने की ट्रेनिंग किनकी हो रही थी? यदि मंचासीन भगवा गिरोह उन्मादी भीड़ को शान्त कर रहा था तो मस्ज़िद को टूटता देख “एक धक्का और दो” जैसे नारे लगाकर प्रफुल्लित हो मंच पर धमाचौकड़ी कौन कर रहा था? यदि ‘लिब्रहान आयोग’ की रिपोर्ट से लेकर ‘राम के नाम’ जैसी उत्कृष्ट दस्तावेज़ी फ़िल्म तक में शामिल तमाम ऑडियो-वीडियो सबूत दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त हैं तो फ़िर घुमाने-फिराने की बजाय सीधे यही क्यों नहीं कह दिया जाता कि संघी-साम्प्रदायिक हिंसा, हिंसा न भवति! यह भी विडम्बना ही है कि मस्ज़िद विध्वंस मामले में क्रिमिनल कोर्ट का फैसला सिविल कोर्ट के भी बाद में आया है। दोनों ही फ़ैसलों के लिये 28 साल का लम्बा इन्तज़ार करना पड़ा जिस दौरान 49 में से 17 अपराधी तो “बेचारे” उन्माद भड़काने का कलंक माथे पर लिए हुए पहले ही दुनिया से रुखसत हो चुके हैं!
आपको पता हो 1528 में बाबर के एक सिपहसालार मीर बाक़ी द्वारा बनवायी गयी बाबरी मस्ज़िद को साम्प्रदायिक फासीवादियों के नेतृत्व में तैयार हुई एक उन्मादी भीड़ ने 6 दिसम्बर 1992 में ढहा दिया था। तमाम इतिहासकारों और सुप्रीम कोर्ट तक के द्वारा वहाँ राममन्दिर होने से इनकार किया जाता रहा था, इसके बावजूद भी इस समाज विरोधी कुत्सित कार्य को अंजाम दे दिया गया। और यदि वहाँ कोई मन्दिर होता भी तो भी इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि इतिहास के हर कार्य का बदला वर्तमान में नहीं लिया जा सकता जैसे थोड़ा और पीछे जायेंगे तो बहुत सारे मन्दिर बौद्ध मठों और स्तूपों की जगह बनाये गये हैं। निश्चय ही बाबरी मस्ज़िद विध्वंस समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का फासीवादी प्रयास ही था। इस घटना के तुरन्त बाद पूरा भारतीय उपमहाद्वीप दंगों की आग में धू-धू कर जल उठा था। दंगों में हज़ारों बेगुनाह लोग मारे गये थे, स्त्रियों-बच्चों को खासतौर पर निशाना बनाया गया, लाखों लोग विस्थापित हुए थे और करोड़ों-अरबों रुपये की सम्पत्ति नष्ट हुई थी। यह दुष्कर्म भारत के तथाकथित लोकतन्त्र के इतिहास का भयंकरतम अपराध था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने न केवल भाजपा की कल्याण सिंह की सरकार की भूमिका पर सवाल उठाये थे बल्कि तमाम इनपुट होने के बावजूद ऐसा होने देने के लिए खुद की असंगत भूमिका को भी स्वीकार किया था। बाद में बाबरी मस्ज़िद विध्वंस पर बने लिब्रहान आयोग के द्वारा तो संघ, भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद, शिवसेना, बजरंग दल समेत तमाम संघी समाजविरोधी ताकतों और इनके सरगनाओं की भूमिका पर सवाल खड़े किये गये थे और मस्ज़िद को गिराये जाने को बहुत बड़ा षडयन्त्र स्वीकारा था।
इस आपराधिक कुकृत्य को अंजाम देने के लिए संघी गिरोह के विभिन्न संगठनों-मंचों समेत शिवसेना के 49 लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द एफआईआर दर्ज की गयी थी। और यह केस सीबीआई को सौंपा गया था। अब 28 साल पुराने केस में लखनऊ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, नृत्यगोपाल दास, साध्वी ऋतम्भरा सहित सभी जीवित 32 आरोपियों को बरी कर दिया है। बाकी 17 लोग न्याय व्यवस्था की सुस्ती-पस्ती के चलते कुदरत के हाथों ही मारे गये थे तथा भविष्य में बाकी बचे 32 भी शायद ऐसे ही दुनिया को अलविदा कहें क्योंकि आज के सत्ताधारियों से तो क्या ही न्याय की उम्मीद करें!
बाबरी मस्ज़िद विध्वंस का कुकर्म फासीवादी गिरोह हेतु चुनावी राजनीति में संजीवनी बूटी सिद्ध हुआ है। चन्द सीटों पर सिमटने वाली भाजपा के लिए साम्प्रदायिक हिंसा के इस नये चरण के बाद सीटों की बहार आती गयी और यह प्रक्रिया 2014 से लेकर 2019 तक दिखती है। बाबरी मस्ज़िद विध्वंस के मामले में आये बाकी तमाम फ़ैसले भी “बहुसंख्यक की तथाकथित भावनाओं” के पक्ष में ही आये हैं। यह एक लम्बे दौर में संघ परिवार द्वारा न्यायपालिका समेत सभी पूँजीवादी निकायों के व्यवस्थित ढंग से संस्थागत फ़ासीवादीकरण का ही नतीजा और परिणति है। भारत में 1980 के दशक में पब्लिक सेक्टर पूँजीवाद अपने सन्तृप्ति बिन्दु तक पहुँच गया था और व्यवस्था का संकट बेरोज़गारी, ग़रीबी और महँगाई के रूप में और भी तेज़ी के साथ फूटने लगा था। मेहनतकश जनता का ध्यान समस्याओं के असली कारणों से भटकाने की नये सिरे से शुरुआत भी तभी हो गयी थी। असल में साम्प्रदायिक फासीवादी उभार का यह अभूतपूर्व रूप से नया चरण था। इसी समय मन्दिर आन्दोलन शुरू हुआ और व्यवस्था के प्रति उभरे लोगों के गुस्से को आपसी नफ़रत में तब्दील करके जनता को भयंकर दंगों की आग में झौंक दिया गया। फासीवादी सत्ता कमेरों के एक-एक हक़ को छीनकर उनके खून-पसीने को पूँजीपतियों की तिजोरियों में भरने का ही काम करती है और यही काम आज भारत में भी हो रहा है। जाति-मज़हब से ऊपर उठकर आम छात्रों-युवाओं और मेहनतकश जनता की एकजुट ताकत ही फासीवाद को हरा सकती है और हरायेगी भी।
निश्चित रूप से बाबरी मस्ज़िद विध्वंस के सरगनाओं को बरी करने वाला सीबीआई की स्पेशल कोर्ट का फैसला न्यायबोध के मुँह पर करारा तमाचा जड़ता है और धर्मनिरपेक्ष की भावना का मज़ाक बनाता है। यह निश्चित है कि भविष्य इस मामले में ज़रूर असल न्याय करेगा। तय है कि न्याय के कटघरे में आज के बच निकले उन्मादियों के वारिसों को अवश्य खड़ा किया जायेगा और उन्हें असली सज़ा सुनायी जायेगी जिसकी कि तत्काल तामील भी होगी।
(नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन और स्त्री मुक्ति लीग का साझा बयान)
