क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त अमर रहें! HSRA की क्रान्तिकारी विरासत जिन्दाबाद!!

भगतसिंह ने 8 अप्रैल 1929 को असेम्बली में बम फेंक कर बहरों को धमाके के साथ सुनाया था कि भारत की जनता साम्राज्यवादी औपनिवेशिक गुलामी से आज़ादी चाहती है और वह इसे लेकर रहेगी। यह काम भगतसिंह ने अपने एक साथी के साथ मिलकर किया था। इस क्रान्तिकारी का नाम था ‘बटुकेश्वर दत्त’। भगत सिंह को फाँसी हुई लेकिन बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काले पानी भेज दिया गया। दत्त चाहते तो सावरकर की तरह माफी माँग कर “वीर” बन सकते थे। लेकिन नहीं! उन्होंने एक सच्चे क्रान्तिकारी की तरह कभी माफी नहीं माँगी। वहां से जब वह छूट कर आये तो उनका संगठन खत्म हो चुका था। वह खुद टीबी के शिकार हो गए थे। लेकिन देश की आज़ादी की भावना उनके मन से ख़त्म नहीं हुई थी। इसलिए वह ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हो गए। अंग्रेजों ने उन्हें फिर पकड़ लिया और चार साल की सजा सुना दी। 1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो दत्त की भी रिहाई हुई। फिर वह पटना में रहने लगे। लेकिन आज़ादी के बाद उनका जीवन बेहद ग़रीबी में बीता। उन्होंने कुछ काम करने की कोशिश की। कभी सिगरेट कम्पनी का एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड। लेकिन एक सफल क्रान्तिकारी काम धन्धे में सफल नहीं हुआ। ट्रांसपोर्ट का काम शुरू करने के लिए वह अपने जिले के डिप्टी कमिश्नर के पास लाइसेंस माँगने गए तो डीसी साहब ने उनसे पूछा कि साबित करो कि तुम स्वतंत्रता सेनानी हो। ऐसे ही ग़रीबी में जीते हुए दत्त 1964 में गम्भीर रूप से बीमार हो गए। पटना के सरकारी अस्पताल में उन्हें कोई नहीं पूछ रहा था। इस पर उनके मित्र चमनलाल आज़ाद ने एक लेख में लिखा, ‘क्या दत्त जैसे क्रान्तिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए? परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।

इस लेख के बाद सरकारें हरकत में आई। पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को उनके इलाज के लिए समुचित ध्यान देने के लिए लिखा। साथ में एक हजार रुपये का चेक भी भेजा। इसके अलावा उनका इलाज दिल्ली या चंडीगढ़ में करवाने की पेशकश भी की।
अब इसके बाद बिहार सरकार ने अस्पताल को आदेश दिया कि उनका सही इलाज करवाया जाए। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। 22 नवंबर 1964 को उन्हें इलाज के लिए पटना से दिल्ली शिफ्ट किया गया। यहां पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि “उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था जिस दिल्ली में उन्होंने बम फोड़ा था वहीं वे एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाए जाएंगे।”
दिल्ली में बटुकेश्वर दत्त को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। यहां इलाज के दौरान उनकी जांच हुई तो पता चला कि उनको कैंसर हो गया था। अब उनकी ज़िन्दगी नहीं बची थी। बटुकेश्वर दत्त ने अपनी अंतिम इच्छा यह बताई कि उनका अंतिम संस्कार उनके साथी भगतसिंह की समाधि के पास किया जाए। इसके बाद तो उनकी हालत लगातार ही खराब होती चली गई। 17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया। बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।

यह है एक शूरवीर की कहानी जिसने अंग्रेज सरकार को उसके किले में चुनौती दी थी। और आज़ाद भारत की सरकारों ने उसे दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया।

आजादी के बाद सत्ता संभालने वाले हुक्मरानों को शुरू से ही क्रांतिकारियों के विचारों से वही खतरा महसूस होता था जो अंग्रेजों को था क्योंकि यह विचार हर तरह की लूट और अन्याय के खिलाफ थे। इसलिए उन्होंने उसे दबाने-छिपाने-मिटा ने के हर संभव प्रयास किए।
आज जब आज़ादी के 75 साल हो गए तब भी उनके विचारों को तोड़- मरोड़ कर अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जा रहा है।
ऐसे अन्धेरे दौर में इन क्रांतिकारियों की विरासत को सहेजने संभालने और हर इंसाफ पसन्द व्यक्ति तक ले जाने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी ही है।
आज बटुकेश्वर दत्त का स्मृति दिवस है।

Related posts

Leave a Comment

seventeen − 7 =