भगतसिहं राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून पारित करो!
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अब नींद से जागो!
झूठे मुद्दों में उलझने की जगह बेरोज़गारी के खिलाफ़ एकजुट हो ! 

साथियो!
देश में बेरोज़गारी विकराल रूप ग्रहण कर चुकी है। सरकार इसे दैवीय आपदा बताकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहती है। कोरोना महामारी का बहाना बनाकर बेरोज़गारी को आकस्मिक आन पड़ी आपदा बताया जा रहा है। परन्तु नौजवानों ने मोदी सरकार की असलियत को समझते हुए प्रधानमन्त्री और भाजपा के खिलाफ़ सोशल मीडिया चैनलों पर अपना रोष व्यक्त किया। सितम्बर माह में दो बार बेरोज़गारों ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ़ मोर्चा भी खोला। परन्तु सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। सरकार ने सरकारी कम्पनी बेचने और सरकारी नौकरियों को खत्म करना जारी रखा। केजरीवाल ने भी मोदी की तरह रोज़गार से जुडे़ मुद्दों पर केवल हवाबाजी की है। हमारे सामने रास्ता स्पष्ट है। अब नींद से जागकर इस बहरी सरकार के कानों तक अपने हक़ की आवाज़ उठानी होगी। अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी। हम सभी छात्रों-नौजवानों-मज़दूरों का आह्वान करते हैं कि बसनेगा अभियान के तहत जुड़कर अपनी बिखरी ताकत को एकजुट करें और रोज़गार के अधिकार को सरकार से छीन लें।
न रोटी न रोज़गार, सरकार से मिली लाठियॉं
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जनता का जीवन हुआ मुहाल, अम्बानी-अदानी मालामाल
कोरोना संकट पर जनवरी से मार्च तक ऑंख मूँद कर बैठी सरकार ने मार्च अन्त में आनन फानन में लॉकडाउन लागू कर दिया। इस लॉकडाउन से बीमारी तो काबू नहीं हुई, जनता के हिस्से में बेरोज़गारी और भूखमरी ही आई है। कोरोना महामारी से पहले ही बेरोज़गारी अपने चरम पर थी जो कि अब और भी भयानक हो चुकी है। बेरोज़गारी की स्थिति कुछ आंकड़ों के जरिए साफ़ हो जाती है। 2019-20 में संगठित क्षेत्र में नौकरियाँ 8.6 करोड़ थीं जो लॉकडाउन के बाद 21% कम होकर अप्रैल 2020 में 6.8 करोड़ रह गयीं और जुलाई के अन्त तक 6.72 करोड़ रह गयी हैं। बेरोज़गारी की अभूतपूर्व स्थिति का अंदाजा इस बात से ही लग जाता है कि इस साल ही अप्रैल से अगस्त के बीच केवल संगठित क्षेत्र में ही 2 करोड़ नौकरियां गई हैं, जिसमें 50 लाख नौकरी अकेले जुलाई माह में गई हैं। देश में बेरोज़गारी दर 9.1 प्रतिशत है। केन्द्र सरकार के जॉब पोर्टल पर जुलाई-अगस्त के 40 दिनों में 69 लाख बेरोज़गारों ने रजिस्टर किया, जिसमें काम मिला मात्र 7700 को यानी सिर्फ़ 0.1% लोगों को, यानी 1000 में सिर्फ़ 1 आदमी को। केवल 14 से 21 अगस्त के बीच 1 सप्ताह में 7 लाख लोगों ने रजिस्टर किया जिसमें मात्र 691 लोगों को काम मिला, जो 0.1% यानी 1000 में 1 से भी कम है। छात्रों को कैम्पस खाली करवाने से फरमान दिए गए और कोचिंग में जाने वाले छात्रों के किराए के कमरे भी जबरन खाली करवाए गए।
गरीब मेहनतकश जनता पर कोरोना बीमारी के साथ ही भूखमरी और बेरोज़गारी ने कहर बरपा किया। सरकार ने लोगों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया। दिहाड़ी मज़दूर, घरेलू कामगार और फैक्ट्री मज़दूरों का काम तो छूटा ही और करोड़ों लोग शहरों से अपने गाँव जाने को मजबूर हुए। न सिर्फ मज़दूर आबादी बल्कि आम छात्र-नौजवानों की ज़िन्दगी भी लॉकडाउन में मुहाल हो गई। एक तरफ़ कोरोना बीमारी के क़हर से आम जनता की जि़न्दगी तबाह हुई तो दूसरी तरफ़ मोदी सरकार ने लोगों को नौकरी छिनने, घर में राशन खत्म होने की सूरत में ‘आत्मनिर्भर’ यानी मरने के लिए छोड़ दिया। दिल्ली सरकार ने भी इस समय केवल हवाई बातें की और आम जनता के जीवन की स्थिति को बदलने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। मोदी सरकार सरकार ने इस दौरान क्या किया? सरकार ने लॉकडाउन के समय भूख से तड़पते मज़दूरों पर लाठियां चलवाईं, लोगों के लिए घर जाने का इंतजाम नहीं किया और जब लोग पैदल जाने लगे तो उन्हें रोकने के लिए बार्डर सील करवा दिए। गोदामों में अनाज पड़ा रहा जिसे लोगों में बॉंटा नहीं गया, जबकि लोग भूख से मर रहे थे। रेल की सुविधा जब शुरू हुई तो उसमें भी सरकारी लापरवाही के चलते भूख और गर्मी से दर्जनों मज़दूर मारे गए। जनवादी कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फँसा कर जेल में बंद कर दिया। कोरोना आपदा से निपटने के नाम पर प्रधानमन्त्री ने पीएम केअर फण्ड में चन्दा जमा किया परन्तु इसका आम जनता के लिए इस्तेमाल नहीं किया और बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए सरकार ने इसका हिसाब देने से भी मना कर दिया। यह भी काफ़ी नहीं था तो सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में एक कृषि अध्यादेश के जरिए बदलाव किया जिससे बुनियादी खाद्य पदार्थों की जमाखोरी करने की इजाज़त दे दी गई। इससे आम जनता की जेब पर ही डाका डलने वाला है। पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें तो पहले ही सभी रिकॉर्ड तोड़ चुकी हैं। इस त्रासदी का सबसे नंगा फायदा उठाते हुए मोदी सरकार ने सरकारी कम्पनियां बेचने के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले, नौकरियां खत्म कर दी, शिक्षा को पूरी तरह कॉरपोरेट घरानों के हवाले और भगवाकरण करने की नीति कैबिनेट में मंजूर की। केजरीवाल ने भी लॉकडाउन में फैक्ट्री मालिकों की चिन्ता करते हुए उनके लिए कर माफी की योजना की घोषणा की परन्तु छात्रों-नौजवानों-मज़दूरों के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। केजरीवाल ने इस दौरान रोज़गार मेले की नौटंकी की जिसका असल मकसद प्राइवेट कम्पनियों को सस्ती मज़दूरी पर खटने वाले नौजवान मुहैया करना था। मोदी सरकार ने बैण्ड-बाजे के साथ 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की परन्तु उसमें भी चालाकी से कई पुरानी योजनाओं के तहत आवंटित किए जाने वाले पैसे को जोड़ दिया। जबकि सरकारी खजाने से जो पैसा नए पैकेज के रूप में दिया गया वह आम जनता को नहीं बल्कि टाटा-बिडला- अम्बानी को मिला। यह अनायास नहीं कि भारत के मुट्ठी भर अमीरों (अम्बानी, अदानी सरीखे) की आय में लॉकडाउन में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। पूंजीपतियों को फायदा देते हुए मोदी सरकार ने श्रम कानूनों को खत्म कर श्रम संहिताएं बनाई हैं जिसके तहत मज़दूरों के रहे-सहे अधिकार भी छिने जा रहे हैं। यह भी सोचने की बात है कि इस ‘आपदा’ में ‘अवसर’ ढूंढते हुए मोदी सरकार ने अमरीका से मोदी जी के लिए 8300 करोड़ का नया हवाई जहाज खरीदा, संसद की नई बिल्डिंग बनवाने का ठेका टाटा को दे दिया। जब जनता बेरोज़गारी और भूखमरी से जूझ रही थी तक मोदी सरकार की प्राथमिकता महँगे हवाई जहाज खरीदने की थी। लेकिन सवाल तो हमपर भी उठता है! क्या हम अपनी जि़न्दगी के असल मसलों पर ध्यान देने की जगह गोदी मीडिया की झूठी खबरों के मोहपाश में कैद नहीं थे? आज नौजवानों की बड़ी आबादी धर्म, अंधराष्ट्रवाद और जाति के मसलों में उलझी है और इसका फायदा उठाकर ही सरकार नौकरियां खत्म कर रही है। जब देश की नौजवानी सोती है तो शासक जनता की बर्बादी को खुशहाली की तरह पेश करते हैं।
बेरोज़गारी कोई दैवीय आपदा नहीं बल्कि व्यवस्थागत है!
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2014 के बाद से मोदी सरकार ने जिस कदर कॉरपोरेट घरानों को छूट दी है उस कारण ही आज बेरोज़गारी अपने चरम पर है। यूं तो 1990 के बाद से कांग्रेस जिन निजीकरण उदारीकरण की नीतियों को लेकर आई थी उसके बाद से ही बेरोज़गारी लगातार बढ़ती रही है। इन नीतियों को जिस गति से भाजपा ने अंजाम दिया वह अभूतपूर्व है। हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का जुमला उछालकर सत्ता में आये मोदी ने आने के साथ ही वे सारे काम करने शुरू कर दिये जिनसे रोज़गार पैदा होने के बजाय और घटते ही। दरअसल पूरी दुनिया के पैमाने पर पूँजीवादी व्यवस्था भीषण संकट का शिकार है जिसका कोई स्थायी इलाज उसके पास नहीं है। मोदी के पास इस संकट को दूर करने का कोई उपाय तो था नहीं, उल्टे भाजपा सरकार ने देशी-विदेशी पूँजीपतियों को लूट की खुली छूट देने के लिए जो क़दम उठाये उनसे अर्थव्यवस्था की हालत और खस्ता होती गयी। रही-सही कसर नोटबन्दी और जीएसटी ने पूरी कर दी। 2019 के शुरू में जब यह बात सामने आयी कि पिछले 45 वर्ष में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी देश में हो चुकी है तो सरकार ने बेरोज़गारी के आँकड़े देना ही बन्द कर दिया। लेकिन सीएमआईई की रिपोर्ट ने पिछले वर्ष ही बताया था कि 2014 से 2019 के बीच क़रीब 5 करोड़ लोगों का रोज़गार छिन गया। अगर दिल्ली की बात करें तो यहॉं भी बेरोज़गारी अपने चरम पर है। दिल्ली में 2013 में 9.13 लाख बेरोज़गार थे जोकि 2014 में बढ़कर 10.97 लाख हो गये यही नहीं 2015 में इनकी संख्या 12.22 लाख हो गयी। केजरीवाल ने 55,000 खाली पदों को तुरन्त भरने और ठेका प्रथा ख़त्म करने की बात की थी परन्तु अब इस मॉंग को यह ठग पूरी तरह भूला चुका है। दरअसल हमें समझना होगा कि इस व्यवस्था में बेरोज़गारी एक सतत परिघटना बनी रहती है। दिमाग पर जोर डालकर सोचने पर हम समझ सकते हैं कि सभी को रोज़गार देने के लिए तीन चीज़ें चाहिए (1) काम करने योग्य हाथ (2) विकास की सम्भावनाएँ (3) प्राकृतिक संसाधन। हमारे देश में तीनों की कोई कमी नहीं है। फिर बेरोज़गारी क्यों है? मुनाफा केन्द्रित व्यवस्था में उत्पादन के साधनों का मालिकाना पूंजीपतियों के पास होता है और उनका एकमात्र मकसद मुनाफा पैदा कमाना होता है। सभी को रोज़गार एक ऐसी व्यवस्था दे सकती है जिसके केन्द्र में मुनाफ़ा नहीं इंसान हो। शहीद-ए-आज़म भगतसिहं ऐसी ही व्यवस्था का सपना देखते थे। उनका सपना आज भी अधूरा है। आज भगतसिहं को याद करने का मतलब यही हो सकता है कि सबसे पहले हम उस मांग की बात करें जो कि सीधे हमारे जीवन से और आम मेहनतकश जीवन के सबसे बुनियादी हक़ यानी रोज़गार से जुड़ी हुई मांग है। हरेक नागरिक के लिए उचित जीवनयापन योग्य पक्के रोज़गार के प्रबन्ध की ज़िम्मेदारी सरकारों की बनती है, यह हमारा जायज़ हक़ है। जिसका सीधा सा कारण यह है कि सरकारी खजाने का बहुत बड़ा हिस्सा जनता से आने वाले अप्रत्यक्ष करों से भरता है। यदि सरकारें जनता को शिक्षा-रोज़गार-चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं दे पाती तो फ़िर ये हैं ही किसलिए? पूँजीपतियों को तो करोड़ों-अरबों रुपये और सुविधाएँ खैरात में मिल जाते हैं, बैंकों का अरबों-खरबों रुपये धन्नासेठों के द्वारा बिना डकार तक लिए निगल लिया जाता है। दूसरी तरफ़ आम ग़रीब लोग व्यवस्था का शिकार बनाकर तबाही-बर्बादी में धकेल दिये जाते हैं! साथियो! केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार के खिलाफ़ हम संघर्ष की घोषणा करते हैं और रोज़गार के अधिकार को हासिल किए जाने तक बिना थके लड़ने का संकल्प लेते हैं। अगर आप भी इस बदहाली को अपनी नियती नहीं मान बैठे हैं तो हमारे अभियान से जुडें।
हमारी प्रमुख माँगें हैं:-
1. ‘हरेक काम करने योग्य नागरिक को स्थायी रोज़गार व सभी को समान और निःशुल्क शिक्षा’ के अधिकार को संवैधानिक संशोधन करके मूलभूत अधिकारों में शामिल करो।
2. केन्द्र और राज्य के स्तर पर जिन भी पदों पर परीक्षाएँ हो चुकी हैं उनमें उत्तीर्ण उम्मीदवारों को तत्काल नियुक्तियाँ दो।
3. केन्द्र और राज्य के स्तर पर तुरन्त प्रभाव से संक्रमण सम्बन्धी सावधानी बरतते हुए ज़रूरी परीक्षाएँ आयोजित कराके सभी खाली पदों को जल्द से जल्द भरो।
4. ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी क़ानून’ पारित करो; गाँव-शहर दोनों के स्तर पर 365 दिनों के पक्के रोज़गार की गारण्टी दो, रोज़गार न दे पाने की सूरत में सभी को न्यूनतम 10,000 रुपये प्रतिमाह गुजारे योग्य बेरोज़गारी भत्ता प्रदान करो।
5. नियमित प्रकृति के कार्य पर ठेका प्रथा तत्काल प्रतिबन्धित की जाये, सरकारी विभागों में नियमित प्रकृति का कार्य कर रहे सभी कर्मचारियों को स्थायी किया जाये और ऐसे सभी पदों पर स्थायी भर्ती की जाये।
6. श्रम कानूनों पर हमला नहीं सहेंगे, श्रम कानूनों में किए बदलाव रद्द करो।
7. आवश्यक वस्तु अधिनियम -1955 में बदलाव लाने वाले कृषि अध्यादेश को वापस लो। मुकम्मिल सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू करो।
नौजवान भारत सभा दिशा छात्र संगठन
सम्पर्क : 8920215205, 9871771292, 9873868097, 8929182904, 9693469694 (व्हाटसएप्प)
