नौजवान भारत सभा, मुंबई द्वारा दि. 7 जनवरी, रविवार के दिन “फ़ासीवाद क्या है?” विषय पर चर्चा सत्र का आयोजन किया गया।

आज फासीवादी ताकतें सत्ता में बैठी है, तब फासीवाद को समझना हमारे लिए एक जरूरी कार्यभार बन जाता है। चर्चासत्र की शुरुआत में साथी अविनाश ने बताया कि एक चिंतक का कहना है कि ‘फासीवाद पर उन सबको चुप रहना चाहिए, जो पूंजीवाद के विषय में नही बोलते है’। ऐसे में हमें अपनी बात पूंजीवाद के विषय से शुरू करनी चाहिए। पूंजीवादी व्यवस्था, एक ऐसी व्यवस्था है जो निजी मालिकाने पर आधारित है, जिसके केंद्र में मालिक का मुनाफ़ा होता है। इस व्यवस्था में मालिकों का पूरा वर्ग आपस में प्रतिस्पर्धा करता है और इस प्रतिस्पर्धा का मैदान होता है पूंजीवादी बाजार। पूंजीवादी उत्पादन में समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं का कोई विस्तृत मूल्यांकन और अनुमान नहीं लगाया जाता है। ऐसे में पूरे समाज में होने वाला उत्पादन किसी योजनाबद्ध तरीक़े से नहीं होता है बल्कि अराजक तरीक़े से होता है। पूंजीवादी व्यवस्था अपनी आंतरिक गति से निरंतर अंतराल पर मंदी का शिकार होता रहता है। ऐसे में 2008 के बाद से एक सतत मंदी का शिकार है। यही आर्थिक मंदी और राजनीतिक संकट के सन्धि बिंदु (conjecture) में फासीवादी या धुर दक्षिणपंथी पार्टी के सत्ता में आने की संभावना होती है। यह उस भौगोलिक इलाके के राजनीतिक सामाजिक आर्थिक इतिहास पर निर्भर करता है। ऐसे में ‘फ़ासीवाद क्या है?’ इस विषय पर आगे बात रखते हुए कहा कि फ़ासीवाद टूटपूंजिया वर्ग का एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आंदोलन है। फासीवादी पार्टी बड़ी पूंजी की सेवा करता है। फ़ासीवाद के उभार के पीछे एक काडर आधारित संगठन होता है। वह बहुसंख्यक जनता के बीच किसी अल्पसंख्यक आबादी को एक काल्पनिक छद्म शत्रु के रूप में खड़ा करता है और उसे उनकी सारी दुःख तकलीफों का ज़िम्मेदार बताता है। यह दुश्मन भिन्न देशों की भूराजनीतिक परिस्थितियों के मातहत बदलते रहते है। भारत में यह शत्रु मुसलमान, तो कभी दलित, प्रवासी मज़दूर या शरणार्थियों को भी बताया जाता है। भारत में फ़ासीवादी उभार के शुरुआती दौर पर चर्चा की गई।

भारत को अंग्रेजों से मिली आज़ादी के बाद समृद्धि, प्रगति और विकास के जो सपने “समाजवाद और कल्याणकारी” राज्य के नारों के साथ दिखलाए गए थे, वे 1980 के बाद टूटने शुरू हो चुके थे। 1947 से 1980 तक के दौर में पब्लिक सेक्टर भारतीय पूंजीवाद की जरूरत थी। जब यह सार्वजनिक क्षेत्र, जो पूंजीपति वर्ग की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, अब उसके विकास में बाधक बनने लगा, तब भारतीय राज्य ने सार्वजनिक क्षेत्र, विनिमियन, लाइसेंसी राज, इंस्पेक्टर राज के दीवारों को गिराना शुरू किया। 1991 में पूंजीपति वर्ग ने उदारीकरण निजीकरण की प्रक्रिया सार्वजनिक क्षेत्र में पूंजीवाद के भयंकर आर्थिक संकट के बाद खुलेआम शुरू की, जिसके सूत्रधार तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह बने। स्वदेशी और छोटे उद्योग धंधों के हित की बात करते हुए भाजपा ने भी अपनी गठबंधन सरकार के काल में भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को तेज़ रफ्तार से लागू किया था। बड़े पैमाने पर छोटे पूंजीपति वर्ग को उजाड़ा और पूरे निम्न पूंजीपति वर्ग के सामने भविष्य की असुरक्षा और अनिश्चितता बेहद तेज़ रफ्तार से बढ़ी। इसी का फायदा भारत में फ़ासीवादी ताकतों यानी संघ परिवार ने उठाया। इस पूरे गुस्से का निशाना संघ ने अल्पसंख्यकों को और विशेष तौर पर मुसलमानों और शरणार्थियों को बनाया।

संघ जिसकी शुरुआत 1925 में हुई थी। अपनी शाखाओं, संस्कृति केंद्रों, शिशु मन्दिरों के जरिए लगातार ज़हर घोलने का काम किया। 1980 के बाद दिमागों में बोये गए ज़हर के इस बीज के अंकुरित होने के लिए सभी अनुकूल परिस्थितियां तैयार होने लगी थी। 1980 के बाद संघ की अपील कहीं ज्यादा व्यापक हुई और फासीवाद का उभार एक परिघटना के रूप में वास्तविकता बनकर उभरा। राम जन्मभूमि आंदोलन, रथयात्राओं, बाबरी मस्जिद ध्वंस, 1991 के संकट के बाद और 1995 तक उदारीकरण निजीकरण के विनाशकारी परिणामों के बाद भारत में फ़ासीवादी आंदोलन कहीं ज्यादा ताकतवर होकर उभरा था। 2008 से सतत आर्थिक संकट और इसी वक्त यूपीए 2 शासन काल में घोटालों, बढ़ती बेरोजगारी और अनिश्चितताओं की जमीन बढ़ती जा रही थी। इसी वक्त आरएसएस के अन्ना हजारे ने “भ्रष्टचार” विरोधी आंदोलन में अपने कार्यकर्ताओं को भी लगाया। साथ में मुजफ्फरनगर में दंगे भी कराए गए, ताकि चुनावों में वोटों की फसल काटी जा सके। इसके अलावा पूंजीपतियों के एक धड़े ने जमकर भाजपा और मोदी का चेहरा चमकाने के लिए पैसा बहाया। जिसके बाद 2014 में फासीवादी मोदी सरकार सत्ता में बैठ पाई। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपने पूंजीपति आकाओं की सेवा भी ढंग से की है, श्रम कानून को कमजोर करना, सरकारी संस्थानों को बेचना और निजीकरण उदारीकरण की नीतियों को तेज रफ्तार से बढ़ाने का काम किया है।

अन्त में “फ़ासीवाद से कैसे लड़े?” इस पर चर्चा की गई।
आज यह समझने की ज़रूरत है कि भाजपा चाहे सत्ता में हो हा ना हो, फासीवाद का अस्तित्व समाज में बना रहेगा। फासीवाद को परास्त करने के लिए हमें संस्थाबद्ध क्रान्तिकारी सुधार कार्यों द्वारा जनता के बीच जैविक सामाजिक आधार को विकसित करना, इलाकेवार जनता के जुझारू व लड़ाकू रूप में संगठनबद्ध करना, फ़ासीवादी विचारधारा व राजनीति के विरुद्ध सतत् क्रान्तिकारी प्रचार कर उसकी असलियत को जनता के सामने उजागर करना, और तात्कालिक तौर पर बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, आवास, शिक्षा व चिकित्सा तथा साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनता के जुझारू जनान्दोलन खड़े करना जो कि इन सभी सवालों पर एक ठोस कार्यक्रम व नारा पेश करता हो। यह आज के अहम कार्यभार है।
इसी के तहत नौजवान भारत सभा ने अन्य क्रांतिकारी संगठनों ने साथ मिलकर ‘भगतसिंह जनअधिकार यात्रा’ निकाली है। जैसे हमने बात की, यह यात्रा ऐसे ही जनान्दोलन की तैयारी की मुहिम है। इस यात्रा का लक्ष्य है आम जनता के मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाना और इसके लिए जनता को जागृत, गोलबन्द और संगठित करना।
इसके बाद चर्चा में जुड़े सभी साथियों से इस यात्रा में शामिल होने की और हर संभव तरीके से इसके लिए सहयोग करने की अपील की गई। चर्चा सत्र में कुल 17 साथी शामिल थे। सत्र का संचालन साथी अविनाश ने किया।

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