किताबें जादू जानती हैं
हमें देखना हो बाहर की दुनिया तो खुली खिड़की बन जाती हैं,
कभी आईना बन हमारा ख़ुद से सामना कराती हैं,
तो कभी उड़न खटोला बन हमें बादलों की सैर कराती हैं,
कभी हमारी आत्मा को ठंडा हो जाने से बचाती हैं,
गरम कोट बनकर
कभी होता है ऐसा भी ,
तूफानी अंधेरे में लाइट हाउस बन राह दिखा जाती हैं
– कोंपल बाल पत्रिका से
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मुंबई में 6 महीने से जारी है ‘फिरते वाचनालय’

नौजवान भारत सभा द्वारा पिछले छः महीनों से मुम्बई के गोवंडी-मानखुर्द इलाके में फिरते वाचनालय चलाया जा रहा है। किताबों के बक्से में बच्चों के लिए अच्छी-अच्छी कविताएं, कहानियां, विज्ञान और देश दुनिया की अलग अलग जानकारियों से भरी किताबें उपलब्ध होती हैं। किताबें तीनों भाषाओं हिन्दी, मराठी और अंग्रेज़ी में होती हैं। आपको बताते चलें कि मानखुर्द-गोवंडी का इलाका मुम्बई के सबसे बड़े झुग्गी-बस्तियों में आता है। जहां पर दस लाख से भी अधिक आबादी रहती है। जहां पर कमरों के अंदर ताज़ी हवा तो दूर सूरज की रोशनी भी नहीं आती। घर के सामने बजबजाती नालियां और कचरों का ढेर होना, आम सी बात है। ऐसे में बच्चों के लिए पढ़ने का माहौल किस नजरिए से बनेगा इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। हालांकि काफी बच्चे दिलचस्पी से किताबों को देखते है, और पढ़ने की बहुत चाहत रखते है। लेकिन मां-बाप के आर्थिक हालातों और जिंदगी के तमाम जद्दोजहद के बीच बच्चों की पढ़ने की आकांक्षा धरी की धरी रह जाती है। ऊपर से शिक्षा व्यवस्था पर एक नजर डाले तो स्थिति और भयानक नजर आती है। पूरे गोवंडी-मानखुर्द इलाके में सरकारी स्कूलों में बेहद खराब दर्जे की पढ़ाई होती है, जिसके चलते निजी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह नजर आते हैं। निजी स्कूल बच्चों की पढ़ाई के नाम पर बस जनता से पैसा वसूलने का काम करते है। ऊपर से जो पढ़ाया जाता है वह भी घिसा पिटा पुराना पाठ्यक्रम है। उन्हें रट्टामार, क्लर्की और होड़ लगाने वाली शिक्षा दी जाती है। एक तरफ अमीरों की औलादों को तो अच्छी पुस्तकालय से लेकर विज्ञान और लैब, पैसे के दम पर मिल जाते हैं और वे विदेशों में भी पढ़ने चले जाते हैं, लेकिन आम आबादी को पुस्तकालय तो दूर, बुनियादी शिक्षा भी नहीं मिल पाती है। हमारा यह मानना है कि शिक्षा पर किसी का निजी मालिकाना नहीं होना चाहिए और सभी को निःशुल्क और बेहतर एकसामन शिक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन इसके उलट आज बच्चों के पास, अच्छी कविताएं, कहानियां और वैज्ञानिक चेतना पर केन्द्रित पाठ्यक्रमों की भारी कमी है। जो है भी उन्हें भी धीरे धीरे हटाया जा रहा है।
नई शिक्षा नीति 2020, के तहत एक तरफ शिक्षा का बाजारीकरण करने की खुली छूट दी गई है और दूसरी तरफ शिक्षा में फासीवादी-सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। आईसीएससी बोर्ड द्वारा प्रसिद्ध कहानीकार कृष्ण चंद्र की कहानी *जामुन का पेड़* को दसवीं कक्षा से यह कहकर हटा दिया गया कि यह कहानी दसवीं के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं है। असल में साठ के दशक में लिखी गई यह कहानी पूंजीवादी तंत्र के ढुलमुल कार्यनीति पर व्यंगात्मक तंज कसती है जो शासक वर्ग की किरकिरी बनी हुई थी। ऐसे ही 2019 में दिल्ली के दरियागंज में लगने वाले साप्ताहिक पुस्तक बाजार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाने का आदेश दे दिया गया जहां पर हजारों पुस्तक प्रेमी आते रहते थे। साल 2019 में पिथौरागढ़ के छात्रों को पुस्तकालय में नई किताबों के लिए आंदोलन करना पड़ा। एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार प्रति व्यक्ति पर 7 पैसे किताबों के नाम पर खर्च करती है जो यही दिखाता है की सरकार पुस्तकालय के लिए कितनी सजग है। और भी ऐसे कई उदाहरण हैं जिनको पाठ्यक्रम से लगातार हटाने की कोशिश शुरू है। ये उदाहरण यही बतलाते हैं कि किस तरह से सरकारें हमें प्रगतिशील साहित्य पढ़ने से दूर कर रहीं हैं।
फिरते वाचनालय हफ्ते में 2-3 बार चलाया जाता है। बस्तियों में जा कर बच्चों के बीच किताबें लेकर जाते हैं। हर किताब के बदले उनसे दो रूपये लिए जाते हैं। बच्चे फिरते वाचनालय के सदस्यों को देख कर ही खुश हो जाते हैं कि ‘किताबों वाले भैया’ आ गए और दौड़कर अपने सभी दोस्तों को बुला लाते हैं। उन्हे हर रविवार का बेसब्री से इंतजार होता है। हमारी नियमित पाठक शबनम, सबनूर सफीना तो किताबों के बस्ते से सारी किताबें पढ़ चुकी हैं। उनका कहना है कि अब आप और नई किताबें लेकर आइए, इन सब को हम पढ़ चुके हैं। वहीं आरजू हमसे बिल्ली और खरगोश की कहानियों के लिए कहती हैं, चूंकि आरजू अभी अच्छे से पढ़ नही पाती तो उसकी मम्मी उसे पढ़ कर सुनाती हैं इस तरह आरजू की मम्मी भी हमारी नियमित पाठक बन गई हैं और उन्हें भी कहानियां और कविताएं बहुत अच्छी लगती है। दरख्सा दसवीं तक पढ़ने के बाद आगे भी पढ़ना चाहतीं थीं लेकिन अपने घर द्वारा यह कह कर रोक दी गईं कि आगे पढ़कर क्या करोगी। यह बात अपने आप में सत्य है कि समाज में किस तरह लड़कियों को उच्च शिक्षा से वंचित करने की मानसिकता काम करती है। लेकिन जब हम दरख्सा से पहली बार मिले और फिरते वाचनालय के बारे में बात की तब वो बेहद खुश थी। अब वो भी हमारी नियमित पाठक बन गईं हैं। आगे हमने उनसे अपनी पढ़ाई आगे बढाने की बात भी की। उन्हें अंग्रेजी की किताबें पढ़ना पसंद है।
फिरते वाचनालय के सदस्यों ने बताया कि ‘फिरते वाचनालय’ के बारे में सुना, तो वो काफी उत्साहित व रोमांचित थे। उन्होंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि इस तरह झुग्गियों और बस्तियों में बच्चों को कहानियां, कविताएं पढ़ने का मौका मिल सकता है। फिरते वाचनालय के सदस्यों ने खुद काफी कहानियां और कविताएं पढ़ चुके है, जैसे कजाकी, मनमानी के मजे, हम सूरज को देख सकते हैं, छत पर चढ़ गया बिल्ला, कोंपल, गुड की डली आदि।
*आपसे अपील*
आप हमें इस तरह सहयोग कर सकते हैं —
1. नौजवान भारत सभा सभी इंसाफपसंद नागरिकों से अपील करता है कि अगर आप चाहते हैं कि समाज में, बच्चों के बीच सही और तार्किक, वैज्ञानिक पुस्तकें पहुंचे तो आप इस अनूठी मुहिम में हमारे हमसफर बनिए और हमसे जुड़िए। आप अपने कामों से हफ्ते में एक दिन निकालकर वालिंटियर के तहत बच्चों को किताबें देने का काम कर सकते हैं।
2. कुछ बच्चों ने हमारे पास उपलब्ध सारी किताबों को पढ़ लिया हैं और हमारे पास अंग्रेजी की बहुत कम और उर्दू की तो कोई भी किताब नहीं हैं। आप हमें वैज्ञानिक और प्रगतिशील कहानियों और कविताओं की पुस्तकें उपलब्ध करा सकते हैं।
3. आप हमें ‘फिरते वाचनालय’ में पुस्तकों के लिए आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
Contact – 8826265960, 9651888368
