दिनांक 24.08.22 को नौजवान भारत सभा मुंबई के सदस्यों द्वारा शहीद शिवराम राजगुरु के जन्मदिवस के अवसर पर चर्चा सत्र आयोजित किया गया

दिनांक 24.08.22 को नौजवान भारत सभा मुंबई के सदस्यों द्वारा शहीद शिवराम राजगुरु के जन्मदिवस के अवसर पर चर्चा सत्र आयोजित किया गया। चर्चा सत्र में शिवराम राजगुरु की जिंदगी और उनके क्रान्तिकारी सफर के बारे में बात की गई।
राजगुरु एक सच्चे क्रांतिकारी थे जिनको अंग्रेज सरकार द्वारा सौंडर्स हत्याकांड के मामले में भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी दी गई थी। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) नाम के एक पार्टी के सदस्य थे, जिसका मकसद भारत में समाजवाद की स्थापना करना था और उसे एक ऐसा राज्य बनाना था जहां पर अमीर-गरीब और ऊंच-नीच का अंतर न हो, जहां पर हर व्यक्ति अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्थक रोजगार हासिल कर एक इज्जत की जिंदगी जी सके और जहां एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का शोषण कर पाना असम्भव हो। राजगुरु पहचानते थे कि ऐसी व्यवस्था साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के अंतर्गत संभव नहीं है और यही कारण था कि उन्होंने क्रांतिकारी रास्ता अपनाया।
संजीव, राहुल, अविनाश, प्रज्ञा और सुप्रीत ने अपनी बात रखते हुए कहा कि राजगुरु 6 साल के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया जिसके बाद उनकी देखभाल की जिम्मेदारी उनके बड़े भाई पर पड़ी। भाई के साथ रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे। लगभग सारे बच्चों की तरह पढ़ाई से ज्यादा उनका मन खेल कूद और मस्ती में ही ज्यादा लगता था, जिसकी वजह से स्कूल में और घर में उन्हें काफी डाट सुननी पड़ती थी। जब ऐसे ही एक बार उनके भाई ने नाराज होकर उनसे कहा कि अगर तुम्हे पढ़ना नहीं है तो घर से निकल जाओ, 16 साल के राजगुरु ने उस बात को दिल से ले लिया और जेब में 9 पैसे लेकर घर छोड़कर निकल पड़े। एक गांव से दूसरे गांव पैदल भटकते रहे, मंदिरों में भूखे पेट सोए । कभी एक साधु का सहारा मिला तो कभी किसी स्कूल के मास्टर ने उन पर तरस खाया और दो वक्त की रोटी खिला दी। ऐसे ही घूमते घूमते ठोकर खाते, गाली झिड़कियां अपमान सहते राजगुरु काशी पहुंचे जहाँ कुछ समय बाद उन्हें एक स्कूल में ड्रिल मास्टर की नौकरी मिली। काशी में उनका संपर्क स्वदेश साप्ताहिक के सह संपादक मुनेश्वर अवस्थी से हुआ जिनके द्वारा वे क्रांतिकारी दल में शामिल हुए। राजगुरु के उत्तरवर्ती क्रांतिकारी जीवन, सैंडर्स हत्याकांड में उनकी भागीदारी, गिरफ्तारी, दूसरी भूख हड़ताल में उनकी भूमिका पर भी बात की गई। राजगुरु दरअसल मजाकिया स्वभाव के थे और उनके क्रांतिकारी जीवन के कई हंसी मजाक के किस्से भी सुनाए गए।
राजगुरु कहा करते थे कि “गरीबी अभिशाप है और प्यार का आभाव नर्क है” । वह इस बात को पहचानते थे कि दुनिया असल में हसीन और खूबसूरत है। लेकिन ये पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था सिर्फ कुछ चंद मुट्ठी भर लोगों तमाम ऐयाशी के टापू खड़े करती है और बाकी दुनिया को गरीबी, भुखमरी और अंधकार में धकेलकर उनको जानवरों की जिंदगी जीने में मजबूर कर देती है। वे जानते थे कि अगर दुनिया में फिर से खूबसूरती और प्यार को जिंदा करना है तो इंकलाब के जरिए पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था का विध्वंस किए बगैर कोई रास्ता नहीं है और इसके लिए वे अपनी जान की कुर्बानी तक देने के लिए तैयार थे। राजगुरु की जिंदगी हमें यह भी सिखाती है कि क्रांतिकारी भगवान नहीं होते है, उनमें भी कमियां होती है, वे भी गलतियां करते है लेकिन उन गलतियों से सीखते है, ईमानदारी से काम करते है और क्रांति के प्रति उनका अटूट विश्वास होता है। आज के समय में, जहां पूंजीवादी बर्बरता और शोषण अंग्रेज़ों के ज़माने से कई गुना ज्यादा भयंकर है, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रान्तिकारियों की जिंदगी और उनके विचार और भी प्रासंगिक है और उनके सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी हमारी है।
चर्चा में तेजस, बबन, अविनाश, ईशा, उषा, प्रज्ञा, सुप्रीत, गोपाल, पूजा, ऐमन, राहुल और संजीव शामिल थे।

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